Monday, November 7, 2011

पठन

आज उर्वशी (रामधारी सिंह दिनकर) पढ़ना शुरू किया... उसी में से कुछ जो अच्छा लगा वो यहाँ लिख रहा हूँ...

द्वन्द्व  में रहना मनुष्य का स्वभाव है| मनुष्य सुख की कामना भी करता है और उससे आगे निकलने का प्रयास भी|... [८]

कितना सटीक... इसी द्वन्द्व के आभास से ही तो सब कुछ उपजा है... तभी तो सब शोध है, शोध प्रेम से ले कर अंतरिक्ष तक की दूरियों के इसी द्वन्द्व की ही दें हैं... मेरे विचार से... :)

इसके उपरांत कुछ नर-नारी के सम्बन्ध के बारे में, कुछ मानव और इश्वर के, और कुछ मनुष्यों के दोगलेपन के बारे में भी पढ़ा... आगे पाठक स्वयं बाँच लें | 

नारी नर को छूकर तृप्त नहीं होती, न नर नारी के आलिंगन में सन्तोष मानता है। कोई शक्ति है जो नारी को नर तथा नर को नारी से अलग रहने नहीं देती, और जब वे मिल जाते हैं, तब भी, उनके भीतर किसी ऐसी तृषा का संचार करती है, जिसकी तृप्ति शरीर के धरातल पर अनुपलब्ध है।

नारी के भीतर एक और नारी है, जो अगोचर और इन्द्रियातीत है। इस नारी का सन्धान पुरुष तब पाता है, जब शरीर की धारा, उछालते-उछालते, उसे मन के समुद्र में फेंक देती है, जब दैहिक चेतना से परे, वह प्रेम की दुर्गम समाधि में पहुँच कर निस्पन्द हो जाता है।

और पुरुष के भीतर भी एक और पुरुष है, जो शरीर के धरातल पर नहीं रहता जिससे मिलने की आकुलता में नारी अंग-संज्ञा के पार पहुँचना चाहती है।

परिरम्भ-पाश में बँधे हुए प्रेमी, परस्पर एक दूसरे का अतिक्रमण करके, उसे ऐसे लोक में पहुँचना चाहते हैं, जो किरणोज्जवल और वायवीय है।

इन्द्रियों के मार्ग से अतीन्द्रिय धरातल का स्पर्श, यही प्रेम की आध्यात्मिक महिमा है। ...[८-९]


मनुष्य ने देवताओं की जो कल्पना कर रखी है, उसके गज से अपने-आपको नापने में वह असमर्थ है। [१२]

एकान्त में कोई नहीं मानता कि बघनखा पहनना अच्छा काम है। किन्तु, बाहर आते ही हर कोई उसे पहनना चाहता है, क्योंकि और लोग बघनखे पहने हुए हैं।


युक्ति तो यही कहती है कि नक़ाब पहन कर असली चेहरे को छिपा लेने से पुण्य नहीं बढ़ता होगा। फिर भी, हर आदमी नक़ाब लगाता है, क्योंकि नक़ाब पहने बिना घर से निकलने की, समाज की ओर से, मनाही है।  [१३]

Thursday, December 3, 2009

औरन कहिन

मेरे चहरे पर वक़्त की
निशानियाँ हैं बहुत
कमबख्त जहां ठहरा,
सिलवट सी पड़ गयी